गणेश जी की कहानी | गणेश जी महाराज की कहानी

18 पुराणों में देवी देवताओं को आदर्श बताया गया है । पुराणों में देवी देवताओं की कहानी के साथ पुण्य और पाप का प्रतिफल बताया गया है ताकि सुनने वाले पाप - पुण्य का फेर समझ सकें । वेद व्यास लिखित 18 पुराणों में से एक है , गणेश पुराण | गणेश पुराण में पांच खंड हैं । गणेश पुराण में गणेश जी की लीलाओं का बखान है । हम आपको में गणेश पुराण की सम्पूर्ण कथा इस पीडीऍफ़ में दे रहे है

भारतीय जीवन - धारा में जिन ग्रन्थों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं । पुराण साहित्य भारतीय जीवन और साहित्य की अक्षुण्ण निध हैं । 

इनमें मानव जीवन के उत्कर्ष और अपकर्ष की अनेक गाथाएँ मलती हैं । कर्मकांड से ज्ञान की ओर आते भारतीय मानस चंतन के बाद भक्ति की अवरल धारा प्रवाहित हुई है । 

वकास की इसी प्रक्रया में बहुदेववाद और निर्गुण ब्रह्म की स्वरूपात्मक व्याख्या से धीरे - धीरे मानस अवतारवाद या सगुण भक्ति की ओर प्रेरित हुआ । अठारह पुराणों में अलग -अलग देवी - देवताओं को केन्द्र मानकर पाप और पुण्य कर्म , और अकर्म की गाथाएँ कही गई हैं । आज के निरन्तर द्वन्द्व के युग में पुराणों का पठन मनुष्य को उस द्वन्द्व से मुक्ति दिलाने में एक निश्चित दिशा दे सकता है और मानवता के मूल्यों की स्थापना में एक सफल प्रयास सद्ध हो सकता है । 

इसी उद्देश्य को सामने रखकर पाठकों की रुच के अनुसार सरल सहज और भाषा में पुराण साहित्य की श्रृंखला में यह पुस्तक गणेश पुराण प्रस्तुत है । 1 धर्म और अधर्म , , पुराण साहित्य भारतीय साहित्य और जीवन की अक्षुण्य निध है । इनमें मानव जीवन के उत्कर्ष और अपकर्ष की अनेक गाथाएं मलती हैं । 


निरन्तर द्वन्द्व और निरन्तर द्वन्द्व से मुक्ति का प्रयास मनुष्य की संस्कृति का मूल आधार है । पुराण हमें आधार देते हैं । इसी उद्देश्य को लेकर पाठकों की रुच के अनुसार सरल , सहज भाषा में प्रस्तुत पुराण- साहित्य की श्रृंखला में उप पुराण ' गणेश पुराण ' ।

कैसे हुई गणेश पुराण की शुरुआत


गणेश पुराण भगवान् श्री गजानन के अनंत चरित्र को दर्शाता है । इसको सुनाने और सुनने वाले सभी का कल्याण होता है और श्री गणेश की कृपा बनी रहती है । श्री गणेश प्रथम पूज्य तो हैं ही , साथ ही वघ्नेश्वर भी कहे जाते हैं क्यों क श्री गणेश अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर कर देते हैं । गणेश पुराण श्री गणेश जी की महिमाओं से जुड़ी बहुत सी बातें बताता है ।

गणेश पुराण की उत्पत्ति के बारे में जानने से पहले मह र्ष भृगु द्वारा राजा सोमकान्त को गणेश पुराण सुनाये जाने के बारे में जानना चाहिए । राजा सोमकान्त सौराष्ट्र की राजधानी देवनगर के राजा था । वह वेदों , शस्त्र वद्या आदि के ज्ञान से संपन्न था । 

उसने अपने पराक्रम के बल पर अनेक देशों पर वजय प्राप्त की थी । उसने अपनी प्रजा का पालन पुत्र की भांति कया था । उसकी पत्नी सुधर्मा पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली अति सुंदर तथा गुणवती स्त्री थी । 

राजा भी पत्नीव्रत धर्म का पालन करने वाला अति उत्तम पुरुष था । जितना उत्तम राजा था उतना ही उत्तम उसका पुत्र था , जो सभी तरह की चयाओं में निपुण और प्रजा के भले की सोचने वाला था । राजा का जीवन पूर्ण सुखी और सम्माननीय था । परन्तु युवावस्था के अंत में राजा को कुष्ठ रोग हो गया था । 

बहुत उपचार करवाने पर भी कोई फायदा नहीं तो राजा निराश हो गया और राजपाट छोड़कर वन में जाने की ठान ली । अपने मंत्रियों से पुत्र को राज्य चलने में मदद करने को कहकर राजा ने शुभ मुहूर्त देखकर पुत्र का राज्या भषेक कया और फर वन के लए चल पड़ा । सोमकान्त के पीछे उसका पुत्र सभी मंत्रीगण और प्रजाजन भी चल दिये । 

जिन्हें राजा ने राज्य की सीमा पर पहुंचकर समझाकर वापस लौटाया । पुत्र के कहने पर राजा ने 2 सेवक अपने साथ में ले लये ।  वन में पहुंचकर राजा , उसकी पत्नी और सेवक एक साफ़ और समतल जगह देखकर वश्राम के लए रुके , जहाँ पर उन्हें मह र्ष भृगु का पुत्र च्यवन मला । 

च्यवन से परिचय के पश्चात् च्यवन ने राजा के रोग की बात मह र्ष भृगु से जाकर कही । मह र्ष के कहने पर च्यवन राजा उसकी पत्नी और सेवकों को आश्रम ले गया । जहाँ उन्होंने स्नानादि करके भोजन कर रात्रि वश्राम कया । अगले दिन सुबह उठकर नित्यकर्मों से निवृत होकर राजा मह र्ष भृगु के सामने उपस्थित हुआ । 

महर्ष भृगु ने राजा को उसके रोग का कारण उसके पूर्वजन्म के पाप बतायें । जब राजा ने पूर्वजन्म के पाप के बारे में जानना की इच्छा जताई तो श्री भृगु ने उन्हें पूर्वजन्म में की गयी निर्दोषों की हत्याओं लूटपाट आदि के बारे में बताया । 

मह र्ष ने उन्हें यह भी बताया क कैसे जीवन के अंतिम समय में राजा सोमकान्त ने भगवान श्री गणेश्वर के खंडहर हो चुके मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया जिसके कारण राजा को पुण्य की प्राप्ति हुई । पूर्वजन्म में मृत्यु के बाद जब राजा को यमदूतों ने यमराज के सामने पेश कया तब यमराज के ये पूछने पर क राजा पाप और पुण्य में से कसे पहले भोगना चाहता है , 

राजा ने पुण्य भोगने की बात कही थी । इसी कारण इस जन्म में अब तक राजा बनकर सोमकान्त उसी पुण्य को भोग रहा था परन्तु अब पुण्य का समय ख़त्म हो गया था और पाप भोगने का समय शुरू हो चूका था इस लए सोमकान्त कुष्ठ रोग से पी इत हो गया था । राजा सोमकान्त के रोग से मुक्त होने का उपाय पूछने पर मह र्ष ने उन्हें गणेश पुराण सुनने के लए कहा । 

परन्तु राजा ने तो कभी गणेश पुराण के बारे में कुछ भी नहीं सुना था इस लए राजा ने महर्ष भृगु से निवेदन कया क मह र्ष से ज्यादा ज्ञानी और उत्तम कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हो सकता जो क • गणेश पुराण सुना सके , अतः स्वयं मह र्ष ही राजा को गणेश पुराण सुना दें । मह र्ष ने राजा की बात मान ली और राजा पर अ भमंत्रित जल छिड़का जिससे राजा को एक छींक आयी और उसकी नाक से एक काला और अजीब सा दिखने वाला पुरुष बहार निकला जो बड़ा होता गया और उसे देखकर सभी डर गये । 

यह पुरुष पाप था और मह र्ष के द्वारा राजा पर डाले गये जल के कारण राजा के शरीर से बहार आ गया था । मह र्ष के कहने पर पाप अपनी भूख शांत करने के लए निकट स्थित एक आम के पेड़ के पास गया और जैसे ही आम खाने के लए पेड़ को हुआ तो पूरा पेड़ जलकर भस्म हो गया । इसके घटना के बाद पाप गायब हो गया । राजा को अपने रोग में आराम मल गया था । 

महर्ष ने आम के पेड़ के वापस पहले जैसा न होने तक गणेश पुराण सुनाने की बात कही । राजा के मन में प्रश्न उठा क आ खर गणेश पुराण की रचना कसने की और उन्होंने मह र्ष से यह पूछा । मह र्ष भृगु ने तब राजा को बताना शुरू कया ।

" महर्ष वेदव्यास जी ने जब वेदों में लखी सभी बातों को चार अलग - अलग वेदों में आसान भाषा में बदल दिया तब सभी वद्वानों में उनकी बड़ी तारीफ हुई । इस बात से वेदव्यास जी को स्वयं पर गर्व हो गया । उसी गर्व के चलते अब वह पुराणों की रचना करना चाहते थे , 

इस लिए उन्होंने पुराणों की रचना शुरू की । परन्तु अपने अ भमान के चलते उन्होंने भगवान श्री गणेश की आराधना कये बिना ही पुराणों की रचना शुरू कर दी और गणेश जी को आराधना तो हर शुभ कार्य के पहले अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए थी क्यों क वे तो प्रथम पूज्य हैं । 

वेदव्यास जी से हुई इस गलती का दंड तो उन्हें मलना ही था । पुराणों की रचना करते समय वेदव्यास जी बहुत सी महत्वपूर्ण बातों के वषय में भूलने लगे और इससे पुराणों की रचना में वघ्न होने लगा । वेदव्यास जी काफी निराश हुए और उन्होंने भगवान ब्रह्मा जी से इसके हेतु मलना तय कया और वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे । 

उन्होंने सारी बात ब्रह्मा जी को बताई । तब ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया के भगवान श्री गणेश कसी को भी अभमानी नहीं रहने देते हैं , वे तो सर्वज्ञ हैं । वेदव्यास जी को अपनी भूल का आभास हो गया था और वे इसका पश ्चाताप करने का उपाय जानने के इच्छुक हुए तब ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान श्री गणेश की पूजा करने के लए कहा और उन्हें पूर्ण पूजा वध के बारे में बताया । 

पूजा वध जानने के बाद वेदव्यास जी गणेश जी के बारे में और ज्यादा जानने को उत्सुक हुए तब भगवान ब्रह्मा जी ने उन्हें श्री गणेश जी की महिमाओं के बारे में कई कथाएं कही उन्हीं सब गणपति महिमाओं को संक लत कर मह र्ष वेदव्यास जी ने गणेश पुराण की रचना की थी । ·

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